शुक्रवार, अप्रैल 17, 2009

डेल्ही मे चुनाब

इस बार का लोकसभा चुनाव कई मायनों में पूर्व हुए चुनावों से अलग है, लेकिन दिल्ली के चुनाव में इस बार भी मुकाबला आमने -सामने का ही है। चुनाव पूर्व आए रिपोर्टों के मुताबिक इस बार केन्द्र में सरकार बनने या न बनने में सिर्फ 15-20 सीटों का ही अन्तर रहेगा। ऐसे में सभी पार्टीयां एक-एक सीट पर जी तोड़ मेहनत कर रही है। यही वजह है कि दिल्ली के सातों लोकसभा सीटों पर सभी पार्टीयां अपना पसीना बहा रही है। एक -एक सीट के वजह से ही इस बार पूर्वोतर की सभी सीटों पर हरेक पार्टी ध्यान देने से नहीं चूक रही। ऐसे में भला वो दिल्ली की सात लोकसभा सीटों पर ध्यान देने से चूक कैसे कर सकती है। हाल में हुए दिल्ली विधानसभा सभा चुनाव में कांग्रेस ने लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल की है। कांग्रेस की इस सफलता से उसके पार्टी के नेता तक हतप्रभ रह गए थे। इससे पहले लगातार तीन बार सत्ता में बामपंथी पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा, राष्टीय जनता दल बिहार, कांग्रेस अरूणाचल प्रदेश, भारतीय जनता पार्टी गुजरात, सिक्किम डेमोकेटिक फंट सिककम में आया हुआ है। भारत की आजादी के बाद से हुए चुनाव में सत्ता पांच -दस वर्षो में बदलती रही है,लेकिन दिल्ली में कांग्रेस लगातार तीन बार सत्ता में आए तो चौंकना स्वाभाविक है। कांग्रेस की इस सफलता में शीला दीक्षीत की अहम भूमिका रही है। विपक्षी पार्टी तक कांग्रेस की इस सफलता का श्रेय शीला दीक्षीत को ही दिया। यह अलग बात है कि खुद कांग्रेस पार्टी इसका श्रेय शीला दीक्षित को देने को तैयार नहीं है और सारी वाह-वाही सोनिया गाँधी लूट के ले गई। विधान सभा में मिली सफलता के वाबजूद इस बार के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस अपने को सुरक्षित नहीं महसूस कर रहीे है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि इस बार मुकाबले में शीला दीक्षित और विजय कु मार मलहोत्रा नहीं है बल्कि यह चुनाव दोनों तरफ के सक्षम प्रत्याशियों के बीच लड़ी जानी है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि पिछले लोकसभा चुनाव में दिल्ली की सात लोकसभा सीट में से छह सीट पर कांग्रेस विजय हुई थी । इस बार अगर जनता बदलाव के लिए वोटिंग करती है तो नुकसान कोंग्रेस को ही होगा और भाजपा आगे बढ़ेगी।चुनाव से कुछ दिन पहले 1984 सिख विरोधी दंगे का भूत फिर से बाहर आया है ,जिसकी वजह से कांग्रेस को अपने दो प्रत्याशी सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर को बिना लड़ाए ही मैदान से हटना पड़ा । कांग्रेस अपने प्रत्याशी को मैदान से हटा कर शायद चुनाव में अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद करने लगी है। परंतु यह नहीं भूलना होगा कि गृह मंत्री पी चिदम्बरम के ऊपर एक सिख ने ही जूता फेंका गया था। इससे जाहिर होता है कि 25 साल के बाद भी इस समुदाय के अन्दर कितना आक्रोश अभी भी दबा हुआ है। दिल्ली में पंजाबी समुदाय काफी संख्या में है। जो तिमारपुर, बादली, शालीमार बाग, शकूर बस्ती, बजीर पुर, पटेल नगर, मादीपुर, राजौरी गार्डन , तिलक नगर, हरी नगर, जनक पुरी, जहांगीर पुरी, मालवीय नगर, कालका जी, विश्वास नगर, कृष्णा नगर और शहादरा में भारी संख्या में रहते हैं । यह समुदाय अगर कांग्रेस के खिलाफ गई तो कांग्रेस को इसका खामियाजा न सिर्फ दिल्ली में बल्कि पंजाब तक में देखने को मिल सकता है। शायद इसी को देखते हुए कांग्रेस ने अपने दो प्रत्याशी को हटा लिया है। चुनाव परिणाम के बाद ही यह पता लगेगा कि इसका पंजाबी समुदाय पर क्या प्रभाव पड़ा। दिल्ली में बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के भी बहुत सारे लोग रहते हैं जो बुराड़ी, आदर्श नगर, बजीर पुर, उत्तम नगर, द्वारका,पालम,अम्बेडकर नगर, संगम विहार, तुगलकाबाद, बदरपुर, तिलेकपुरी, कोण्डली, सीलमपुरी, गोकुलपुरी, मुस्तफाबाद और करावलनगर में रहते हैं। यह समुदाय इस बार किस तरफ वोटिंग करते हैं यह देखने वाली बात होगी । इस समुदाय को लेकर दिल्ली की राजनीति में काफी उबाल रहा है। जहां बीजेपी ने लाल बिहारी तिवारी या किसी अन्य पूर्वाचली को टिकट नहीं दिया वहीं कांग्रेस ने महाबला मिश्रा को पश्चिम दिल्ली से लोकसभा का टिकट देकर बाजी मार ली है।कहा तो यह जाता हे कि दिल्ली में जाति ,धर्म आदि के आधार पर चुनाव नहीं होता है ,परंतुयहां भी टिकट वितरण में इन सब बातों पर ध्यान दिया जाता है। यही वजह है कि दिवंगत नेता साहिब सिंह वर्मा के बेटे प्रवेश वर्मा को टिकट न दिए जाने से दिल्ली के जाट समुदाय भाजपा से बहुत ही नाराज हो गए थे । हालांकि यह अलग बात है कि प्रवेश बाद में शांत हो गए । इस बार के चुनाव में सातों सीट पर बहुजन समाज पार्टी मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने के लिए कमर कस के तैयार खड़ी है। बसपा यहां केचुनाव में किसी पार्टी को लाभ किसी को हानि अवश्य ही पहुचांती है भले ही वो खुद कोइ्र सीट न जीत पाएं।दिल्ली में सात मई को होने वाले चुनाव में इस बार कड़ा मुकाबला देखने को मिलेगा। जहां कांग्रेस विधान सभा चुनाव और पिछले लोकसभा परिणाम को दोहराना चाहेगी वहीं भाजपा विधान सभा की करारी शिकस्त को और पिछले लोकसभा चुनाव की नाकामियों को मिटाना चाहेगी।

शनिवार, अप्रैल 11, 2009

पवार कई नावों में सवार

शरद पवार कृषि मंत्री से देश के प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं। इस बार उन्हें लग रहा है कि प्रधानमंत्री बनने का मौका हाथ आ सकता है। इसलिए चुनाव न लड़ने का मन बना चुके पवार फिर से मैदान में हैं, और जमकर पैंतरेबाजी कर रहे हैं। इस चुनाव में मायावती, जयललिता, लालू, मुलायम, रामविलास सहित शरद पवार भी प्रधानमंत्री बनने की इच्छा रखते हैं। ये सभी नेता क्षेत्रीय पार्टी के नेता हैं,जिन्हें लगता है कि अगर कांग्रेस ओर भाजपा दोनों मिलाकर 250 तक सीट नहीं ला पाएं तो ऐसे में क्षेत्रीय पार्टियों का महत्व बढ़ जाएगा। ऐसे में ये किंग मेकर राजनीतिक सौदेबाजी के तहत खुद ही किं ग बन जाना चाहते हैं ।राजीव गांधी के मृत्यू के बाद 1991 में राजनीति से लगभग सन्यास ले चुके पी.वी.नरसिंह राव देश के प्रधानमंत्री बने तो पवार बहुत ही आहत हुए थे।शरद पवार को ऐसा लग रहा था कि, पार्टी उन्हें ही प्रधानमंत्री बनाएगी लेकिन ऐसा नहींं हुआ। 1991 में शरद पवार प्रधानमंत्री तो नहीं बन पाएं लेकिन मन में प्रधानमंत्री बनने की वह इच्छा अभी तक दबी हुई है। नरसिम्हा राव के बाद कांग्रस पार्टी में अध्यक्ष पद के चुनाव में पवार को सीताराम केसरी से मात खानी पड़ी थी । जब विदेशी मूल के मामले पर वह कांग्रेस से अलग हुए तो उनके साथ पी.ए .संगमा, तारिक अनवर थे, लेकिन बाद में सत्ता का मोह पवार को फिर से कांग्रेस के साथ लाया और इनकी राष्ट्रवादी कांग्रेस पाटी ने कांग्रेस के साथ मिलकर महाराष्टÑ और केन्द्र तक में सरकार बनाई। पवार सत्ता से दूर नहीं रहना चाहते हैं। शरद पवार मराठा छत्रप हैं, वे 1978 में महाराष्टÑ में देश के सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री बनने वाले व्यक्ति थे। इनका राजनीति में बहुत ही सशक्त पदार्पण हुआ था । इस बार चुनाव की स्थिति को देखते हुए पवार ने अपना नाम पार्टी कार्यकताओं द्वारा आगे बढ़ाया। पवार यह मान रहे हैं कि इस बार के चुनाव में हालात अलग तरह का रहेगा जिसका फायदा चुनाव के बाद इन्हें प्रधानमंत्री के रूप में मिल सकता है। शरद पवार की मजबूती महाराष्ट्र है। जहां के चीनी मिलों से इन्हें शक्ति मिलती है। केन्द्र में कृषि मंत्री रहते हुए पवार ने जिस तरह अपनी शक्ति बढ़ाने और जनता के बीच में साख बनाने का काम किया है, उसका फायदा वो इस चुनाव में उठाना चाहते हैं। अभी राकपां को महाराष्ट में 9 सीटें ही है जबकि उन्हेंलगता है कि इस चुनाव में मराठी प्रधानमंत्री के नाम पर अधिक सीटें मिल सकता है । साथ ही शिवसेना का समर्थन भी उन्हें मराठी मानुष के नाम पर मिल सकता है। लेकिन शिवसेना ने अपना धोषणा पत्र जारी करते हुए कहा कि मराठी पीएम के मुद्दे पर पवार का समर्थन नहीं करूंगा। फिर भी पवार इस मुगलाते में हैं कि चुनाव के बाद महाराष्ट्रके प्रधानमत्री के नाम पर शिवसेना उनका समर्थन कर सकती है। जैसा कि उसने राष्टÑपति बनाने के लिए प्रतिभा देवी सिंह पाटिल का किया थादूसरी तरफ शरद पवार उड़ीसा के मुख्यमंत्री बीजू पटनायक के तरफ डोरे डाल रहे हैं। लाल झंडा भी बीजू पटनायक का समर्थन पाने को बेताब है क्योंकि माक्र्सवादी चाहते हैं कि केन्द्र में गैर भाजपा-गैर कांग्रेस सरकार बनें जिसमें इन छोटे दलों की भूमिका बहुत बड़ी होगी । ऐसे में शरद पवार को यह लगने लगा कि अगर यूपीए या, तीसरा र्मोचा सरकार बनाने के करीब रहती है और कुछ सदस्यों की जरूरत होगी तो सौदेबाजी के तहत मैं प्रधानमंत्री बन सकता हूं। ऐसा इसलिए भी संभव है क्योंकि शरद पवार का दूसरे पाटियों में इनके काफी भरोसेमंद और वफादार साथी मौजूद हैं जो पवार के नाम पर मुहर लगवाने का काम कर सकते हैं।राजनीति के माहिर खिलाड़ी शरद पवार फिलहाल यूपीए और बहुत ही गुप्त रूप से तीसरे मोर्चे के साथ हैं। चुनाव परिणाम के बाद बन रहे किसी भी परिदृश्य के लिए वे तैयार बैठे हैं। पवार को लग रहा है कि अगर इस बार प्रधानमंत्री नहीं बन पाएं तो आगे फिर कभी नहीं बन पाएंगें। ऐसे में पवार दो नावों यूपीए और तीसरे मोर्चे के साथ सवारी करना चाहते हैं। इस तरह की सवारी कभी-कभी बहुत खतरनाक भी साबित होता है।चन्दन कुमार चौधरी

चुनाब मे काला धन

चन्दन चौधरी , नई दिल्ली चुनाव के समय में टिकटों की खरीद-फरोख्त बहुत ही बढ़ जाती है। हरेक पार्टी पैसा लेकर टिकट बचती है। पिछले दिनों राजद सांसद साधू यादव ने यह आरोप लगाते हुए पार्टी छोड़ दिया कि,पश्चिम चंम्पारन जहां से मैं चुनाव लड़ना चाहता था उसे लोजपा ने प्रकाश झा के हाथों बेच दिया। हरेक पार्टी अपने कुछ प्रत्याशियों को टिकट बेचती है। देखा जाता है कि चुनाव के समय में बहुत सारी शक्ति सक्रिय हो जाती है।जो टिकटों की खरीद फरोख्त में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। जब कोई टिकट पाने भर के लिए कम से कम 30-40 लाख दे रहा हो। उसके सांसद बन जाने के बाद क्षेत्र का बुरा होना स्वभाविक ही है। कर्नाटक विधानसभा चुनाव केबाद माग्रेट अल्वा ने खुले आम मीडिया में कहा कि चुनाव में मेरे पार्टी में टिकटोें की खरीद फरोख्त जमकर हुई । हालांकि उनके इस बयान का उन्हें खामियाजा भुगतना पड़ा लेकिन वे अपनी बयान पे कायम रहीं।हाल के दिनों में मीडिया में यह खबर आई थी कि आंध्र प्रदेश में प्रजाराज्यम पार्टी के प्रमुख चिरंजीवी विधानसभा का एक टिकट 40 से 50 लाख और लोकसभा की एक टिकट ढ़ाई से तीन करोड़ में बेच रहे हैं । चिरंजीवी अपने पूरे फिल्मी जीवन में कभी भी इतना नहीं कमा सकें हैं जितना वो एक चुनाव के दौरान कमा रहे हैं। लोकसभा चुनाव के दौरान साउथ के राज्यों में एक परिवार तीस से पैंतीस हजार तक कमा लेते हैं। चुनाव के दौरान अक्सर नेता और उनके कार्यकर्ता नोट बांटटे देखे जाते हैं।चुनाव के दौरान निकलने वाला यह धन वैसा रुपया होता है जिसका सरकार के पास कोई लेखा-जोखा नहीं होता है । चुनाव जीतने के लिए प्रत्याशी अपनाा काला धन प्रयोग में लाते हैं जिससे वे चुनाव जीत सके। कार्यकर्ता चुनाव के दौरान जितना खर्च दिखाते हैं, निश्चित तौर पर उनका खर्च उससे ज्यादा होता है। प्रत्याशियों के लिए चुनाव से बेहतर और कोई समय नहीं हो सकता जिसमें वो अपना काला धन बाहर निकाल सकें। विश्व अभी मंदी के दौर से गुजर रहा है, उसका असर भारत पर भी पड़ा है। चुनाव के दौरान दिखाके जितना धन खर्च होता है उससे ज्यादा छुपा क र होता है। इस धन से देश को मंदी से उबरने में कुछ मदद तो अवश्य ही मिलेगी ।

गुरुवार, अप्रैल 09, 2009

वनवास से लौटकर कहां जाएंगे ब्राह्मण

लोक सभा चुनाव की घोषणा होने के साथ ही बिहार की सभी पाटियां जाति की गोटी फिट करने में लग गयी है,क्योंकि बिहार में जाति के आधार पर चुनाव होता है। हरेक पार्टी के पास किसी न किसी जाति का वोट बैंक होता है। जहां राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालू यादव माई समीकरण पर निर्भर हैं,वहीं नीतीश कुमार हम पर समीकरण पर।
इस बार बिहार में जद यू भाजपा गठबंधन से आरजेडी लोजपा गठबंधन का सीधा मुकाबला होना है । इन दोनों गठबंधन में बा्रह्मण कहीं भी वोट बैंक के रुप में नहीं है। बिहार की राजनीति में कभी ब्राह्मणों की तूती बोलती थी । यहां जग्ग्नाथ मिश्रा,भागवत झा आजाद सहित कई ब्राह्मण नेता मुख्यमंत्री रह चुके हैं। लेकिन लालू यादव के 1990 में मुख्यमंत्री बनने के बाद यह समुदाय उपेक्षित होता चला गया। 90 के दशक में ब्राह्मणों के उपेक्षित होने में मंडल,कमंडल की राजनीति बहुत महत्वपूर्ण रही है। लालू यादव ने यहां अपनी एक ऐसी छवि बनाई जिस फल का स्वाद वो आज तक चख रहें हैं ।
बिहार में राममनोहर लोहिया के तीनों शिष्य लालू यादव,नीतीश कुमार ओर रामविलास पासवान ने बिहार को जिस वर्ग में बांट दिया उसमें बाह्मण समुदाय कहीं नहीं था । भाजपा जरुर ब्राह्मणों को साथ लेकर चल रही है लेकिन इस वर्ग का एक बड़ा समुदाय यह मान कर चल रहा है कि भाजपा नीतीश की हाथ का कठपुतली हो गई है। जिससे ब्राह्मणों का भाजपा से मोह भंग होने लगा है।
बिहार के लोकसभा चुनाव में सभी पार्टियों ने ब्राह्मण उस हिसाब से टिकट नहीं दिया है। जनता दल यू ने अपने कोटे के 25 लोक सभा सीट में से एक भी टिकट ब्राह्मणों को नहीं दिया है। जबकि भाजपा ने 15 में से सिर्फ दो टिकट ब्राह्मण को दिया है । जदयू ने 2004 के चुनाव में मात्र एक सीट ब्राह्मण क ो दिया था, जो झंझारपुर से पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा थे । उस चुनाव में वह लगभग पांच हजार मतों से चुनाव हार गए थे। इस बार के चुनाव में उस सीट से जदयू ने मिश्रा को टिकट न देकर मंगनी लाल मंडल को दे दिया है। जदयू ब्राह्मण को टिकट न दिए जाने पर कहती है कि मीडिया यह क्यों भूल जाती है कि हमने शिवानंद तिवारी को राज्यसभा में भेजा हुआ है, जबकि हमारी सहयेगी पार्टी बीजेपी ने दो टिकट ब्राह्मण को दिया ही है।
बिहार में ब्राह्मण समुदाय अपने को उपेक्षित महसूस क रने लगे हैं। ऐसे में लालू यादव ने ब्राह्मण के आगे चुग्गा फेंका है। गरीब ब्राह्मण को आरक्षण देने का चारा शायद ब्राह्मण को लुभा सकता है क्योंकि ब्राह्मण समुदाय नीतीश द्वारा पिछड़े समुदाय को सुविधा देने से डरे हुए हैं। उन्हें लगने लगा है कि लालू यादव सिर्फ ब्राहमणों के खिलाफ बयान देते थे जबकि नीतीश उनके हित के खिलाफ काम कर रहें हैं ऐसे में अगर उपेक्षित ब्राह्मण राजद के साथ चला जाए तो कोई आश्चर्य नहीं। ऐसे में बिहार की राजनीति में फिर से कुछ परिवर्तन देखने को मिल सकता है।
अभी तक का हालात ऐसा है कि सभी पार्टी ब्राह्मण को साथ लाने में डर रहे हैं कि इससे कहीं बाकी जाति उनसे दूर न हो जाएं । ऐसे में ब्राह्मण विरोध से ही पैदा हुए लालू ब्राह्मण को साथ लाने का प्रयास कर रहे हैं। यह प्रयास लालू के हित में कितना रहता है यह तो चुनाव परिणाम के बाद ही पता चल पाएगा । फिलहाल लालू का यह प्रयास क्या उनके द्वारा ब्राह्मण समुदाय को दिया गया बनवास की समाप्ति साबित होगी।
चन्दन कुमार चौधरी

बुधवार, मार्च 04, 2009

सूरजकुंड के बहाने दो बात...

सूरजकुंड के बहाने दो बात... ‘‘इस कुंड की यह दुर्दशा! ’’ सुरजकुंड को देखकर सहसा ही अमित के मुंह से यह निकल गया । अमित अपने दोस्तों के साथ यहां धूमने के लिए आया है। मेला देखने के बाद वह पास के सुरज कुंड को देखने चला गया। इस जगह को देखने के बाद उसे इसका सहज अंदाजा हो गया कि इसकी भी कभी रौनक रही होगी । सूरजकुंड का इतिहास काफी पुराना है। इसे तोमर किंग अनंगपाल ने बनवाया था। यह तुगलकाबाद से 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है । 1020 ईस्वी में बने इस वृताकार कुंड मंे भगवान सूर्य का भव्य मंदिर हुआ करता था। इसलिए इसे सूरज कुंड के नाम से जाना जाता है । बाद में दिल्ली पर सल्तनत वंश का राज्य हो गया। जिसके बाद अरावली पर नगर बसाया गया । और इस कुंड में पानी को संरक्षित रखा जाने लगा ताकि रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा किया जा सके । आज यह कुंड पूरी तरह से सुखा पड़ा है। इसमें पानी की एक बूंद भी नहीं है। जब फरीदाबाद और आस-पास के इलाकों में पीने का पानी न मिलता हो तो भला इतने बड़े कुंड में पानी कैसे होगा? इस कुंड की सीढ़ीयां इसकी महानता की कहानी खुद-ब-खुद बयान करती है। हालांकि इसकी हालात जर्जर हो चुकी है लेकिन स्थापत्य के इस बेजोड़ नमूना यह कहती है कि कभी इसके भी दिन सुनहरे रहे होगंे। आज हालत ऐसे हैं कि यहां कुछ जोड़ीयों को रंगरेलियां मनाते हमेशा देखा जा सकता है। यहां बंदरों की फौज भी बड़ी संख्या मे देखी जाती है। इन्हें यहां आए मेहमान से खाने- पीने को मिल जाता है। अमित के साथी रवि भारती इस कुंड की सीढ़ीयोें पर बैठने के साथ ही बोल उठता है- यार प्रशासन इस कुंड की इतनी उपेक्षा क्यों कर रही है? माना कि यहां पानी की समस्या है लेकिन इस ऐतिहासिक कंुड को अवश्य संरक्षण दिया जाना चाहिए। जिससे यहां दिल्ली आने वाले पर्यटक इसे भी देखने को आएं । नहीं तो कछ दिन बाद इस कुंड की सीढ़ीयों में लगे ईंट तक गायब होने लगेंगें। अमित बस मुस्कुरा कर रह गया।

अपना विचार।

1986 में शुरू हुआ शुरू हुआ सूरज कुंड मेला अपनी लोकप्रियता की सीढ़ियां चढ़ चुका है। हर साल यहां आने वाले पयर्टकों की संख्या में अच्छी खासी वृद्धि हो रही है। यह मेला हस्तश्ल्पि , वास्तुकला, और लोकनृत्यों का अनोखा संगम है। यहां आने वाले वास्तुशिल्पी, हस्तशिल्पी, और लोकनर्तकों के चेहरे की संतुष्टि इशारे में ही बहुत कुछ बता जाती है। लोकनर्तकों के साथ फोटो ख्ंिाचवाने के लिए जब कोई जाता है तो वे बहुत खुश होते हैं। मेले में मिल रहे मान, सम्मान और मेहनताना से हस्तशिल्पी, वास्तुशिल्पी और नर्तक, सब काफी प्रसन्न हैं। मेले की सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह से चाक-चैबन्द दिखती है। मेले में प्रशासन की मुस्तैदी लोगों को सुरक्षा से बेफ्रिक करती है। आज जब पूरे समाज से मेले शब्द की धारणा खत्म होती जा रही है इस माहौल में हरियाणा सरकार द्वारा इतने बड़े मेले का सालाना सफल आयोजन वाकई एक सराहनीय प्रयास है। लेकिन मेले में महंगे खाने के स्टॅाल और 50 रूपये की टिकटें कहीं न कहीं आम आदमी को मेले में आने से रोकती है। भले ही मेला प्रशासन के अपने कुछ तर्क और मजबूरीयां हो, लेकिन अगर खाने के दामों और टिकट में कमी हो सके तो आम आदमी भी इस मेले का भरपूर मजा उठा सकता है। राज्य सरकार को इस और अवश्य ही ध्यान देना चाहिए?

झलकियां

1 मेले परिसर के बाहर गाड़ी पार्किंग की व्यवस्था की गई थी। लेकिन अजीबोगरीब स्थिति तब पैदा हो गई जब एक कार वाला गाड़ी पार्क करने को लेकर दूसरे कारवाले से बुरी तरह से उलझ गया। दोनों कारों में सवार परिवार वालों के बीच- बचाव के बाद मामला शांत हुआ।

2 पूरे मेले परिसर में खाना बहुत ही मंहगा था। यहां तक की बाजार में उपलब्ध 4 रूपये की चाय यहां 10 रूपये में मिल रही थी। दिन चढ़ने के बाद भी काफी लोगों ने वहां खाना नहीं खाया। और ‘भूखे भजन न होई गोपाला’। नतीजा वे सब जल्दी घर को लौट रहे थे।

3 मेले में आए विदेशी सैलानियों ने यहां राजस्थान का मजा लिया। उन्होनें जमकर उंट की सवारी की। पांव में धुंधुरू और शानदार ढ़ंग से सजाए गए उंट बहुत ही आकर्षक लग रहे थे ।

4 मेले की भीड़ से अलग मीडिया सेंटर की व्यवस्था की गई थी। यहां का माहौल बिल्कुल शांत था। चाय- पानी की भी व्यवस्था रहने के कारण मीडियाकर्मीयों को यहां पीते-पिलाते देखा गया।

5 आईआईएमसी के छात्रों को लाने और ले जाने के लिए बस की व्यवस्था की गई थी। जाते वक्त अन्ताक्षरी की घुनों ने माहौल को जानदार बना दिया। लेकिन आते समय छात्र इतने थक गए थे कि कइयों के मुंह से आवाज भी नहीं निकल पा रही थी।

6 मेले में इस बार पहली बार मिस्र शामिल हुआ था। यह विशेष आकर्षण का केन्द्र भी रहा । यहां से आए प्रतिनिघि मिल रहे सम्मान से काफी खुश थें।